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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

शतत्रये स वर्षाणामथ याते स्वयंप्रभुः । व्यबुध्यतात्मरूपात्मा धराकोटरपीडितः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी प्रकार की आशंका के बिना आकाशमण्डल में पतित ओर वायु आदि से आकुलित वृष्टि धाराओं की नाई विक्षेपो के हेतु विकल्प- समूह अब नहीं गिरते हँ