Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
तेन नानाविधान्येष जगन्ति परिदृष्टवान् ।
हृदि संवेदनाकाशे वीतहव्यो विवासनः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
दावाग्नि से जिन वृक्षों के पत्ते ओर रस दग्ध हो गये हैं, उन वृक्षों मे वर्षा होने पर पुनः पल्लव और रसों
का जिस प्रकार आविर्भाव हो जाता हे, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्रि से जिनका संसार, जरा और जन्मों से
उपलक्षित महामार्गं नष्ट हो गया है, उन तत्त्वज्ञो में भी आरोग्य, तुष्टि, पुष्टि, कान्ति आदि गुणों का
पुनः आविर्भाव हो जाता हे