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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verses 29–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 84, verses 29–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 29-31

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एवं स्थिते मुनिश्रेष्ठ जीवन्मुक्तमतेरपि । बन्धमोक्षदृशः सन्ति वीतहव्यात्मनो यथा ॥ २९ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । यथास्थितमिदं विश्वं शान्तमाकाशनिर्मलम् । ब्रह्मैव जीवन्मुक्तानां बन्धमोक्षदृशः कुतः ॥ ३० ॥ एतत्संविन्नभो भाति यत्र यत्र यथा यथा । तत्र तत्र तथा तावत्तावत्तद्विन्दते ततम् ॥ ३१ ॥ तेनानुभूतानि बहून्यनुभूयन्त एव च । जगन्ति सर्वात्मतया ब्रह्मरूपेण राघव ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि चेतन का अपने अन्दर अन्तभाव करनेवाले पूर्वसिद्ध मनोरूप से मेरा जीवन तुम क्यो नहीं चाहते और मेरा आत्यन्तिक अभाव क्यो वाहते हो, तो इस पर कहते है। हे चित्त, तुम्हारा अन्तर्भावित चेतनस्वरूप जो प्रसिद्धरूप है, वह यदि सत्य होता, तो उस रूप से जी रहे तुम्हारा अभाव कौन चाहता हे सुन्दर, परन्तु तुम उस रूप से नहीं हो, यानी असत्‌ हो, यह मैं श्रुति, शास्त्र आदि के अनुभव से विचार कर तुमसे कहता हूँ, ऊपर ऊपर से नहीं कहता हूँ; (इस आत्यन्तिक आत्मभाव से अवस्थान तुम्हारे लिए हितकारक भी है, ऐसा कहते हैं ) हे चित्त, इससे “मे जीता हू इस प्रकार की मिथ्या आशा से तुम फूलो मत । जब तुम पहले से ही कल्पित हो, तुम्हारी सत्ता हे ही नहीं, तब जो तुम्हारा अस्तित्व है, वह भरममूलक ही सिद्ध होता हे । हे चित्त,अब वही भ्रान्ति विचार से आत्यन्तिक विनाश को प्राप्त हो गई