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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

तावदेनमुपारुह्य किंचित्प्रविहराम्यहम् । पिङ्गलेन शरीरं स्वमुद्धर्तुं तापनं वपुः ॥ १४ ॥ प्रविशामि नभःसंस्थं मुकुरं प्रतिबिम्बवत् । इत्यसौ मुनिरादित्यं विवेशानिलरूपधृक् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

बरसने पर थोडे ही समय में उक्त पर्वत की कन्दरा में वर्षा के ओघ से भी प्राप्त हुए कीचड़ ने इस महामुनि को पृथ्वी के भीतर यानी भूगर्भ में कर दिया अर्थात्‌ प्रवेशित कर दिया | तात्पर्य यह हुआ कि वर्षा से बहाया गया कीचड़ इनके शरीर के चारों ओर ऐसा घना जम गया था, जिससे कि वे बाहर से नहीं दिखाई पडते थे, पृथ्वी के भीतर प्रविष्ट हो गये थे