Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
पुर्यष्टकवपुर्भूत्वा भस्त्राखमिव चानलः ।
भगवान्मुनिरप्येनं हृद्गतं मुनिनायकम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके भीतर अनेक संकट भरे पड़े थे,
ऐसे उक्त कोटर की भूमि में यह मुनि कीचड़ से संश्लिष्ट कन्धे से युक्त होकर उस प्रकार रहते थे, जिस
प्रकार पर्वत के अन्दर शिला