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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

धरातो मुनिमुद्धर्तुमादिदेशाग्रगं गणम् । वीतहव्यमुनेः संवित्सा पुर्यष्टकरूपिणी ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

तीन सौ वर्षो के बाद उनका जो व्यवहार रहा, उसे कहते हैं। तीन सौ वर्षो की समाधि के अनन्तर उसकी जीवरूपा संवित्‌ ने अवशिष्ट प्रारब्ध के भोग के लिए हृदय के भीतर उन्मेष-क्रम से स्थूलता को प्राप्त कर अपने मन की स्वरूपभूत होकर आगे कहे जानेवाले समस्त विषयों का कल्पना के द्वारा हृदय मेँ ही अनुभव किया