Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अनन्तरमनन्तात्म वीतहव्याभिधं मनः ।
स्वमेवात्मचमत्कारमात्रं समवबुद्धवान् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय महामुनि वीतहव्य किसी
प्रकार के क्षोभ से शून्य परिपूर्ण संवित् प्रकाशरूप आनन्द युक्त होने के कारण अत्यन्त सुन्दर मालूम
पड़ते थे, उनका मन अत्यन्त विलीन हो गया था, अतएव ऐसे भले लगते थे, जैसे प्रशान्त समुद्र भला
लगता है