Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
कलेवरं मुनेः पङ्कान्मृणालमिव सारसः ।
मौनं पुर्यष्टकमथ स्वं विवेश कलेवरम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
असवत्मिकत्वरूप से ज्ञात चिति मे स्वल्प-देश और काल में अन्य विस्तृत देश और काल की
कल्पना करने में नियति का विरोध होता ही है, पर सवत्मिकता और सर्वशक्तिसम्पन्नतारूप से परिज्ञात
चिति में उक्त विरोध नहीं होता, इस आशय से कहते है ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, यह सर्वात्मक चितिशक्ति जहाँ पर जिस जिस प्रकार
से उदित होती है, वहाँ पर उसी प्रकार की शीघ्र हो जाती है, क्योकि सवत्मिकत्व का अनुभव करनेवाले
अनुभविता की चिति का उक्त प्रकार से बन जाना एक स्वभाव ही हे