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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

प्राप विन्ध्यवनं प्रावृण्मत्ताभ्राम्बरभासुरम् । उद्दधार धराकोशान्नखनिष्कृष्टभूतलः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, उन इन्द्रत्व आदि के अनुभवों में देश ओर काल का नियम ओर अनियम कैसे हुआ, क्योकि देश ओर काल की नियति को अन्यथा नहीं कर सकते | तात्पर्य यह है कि : 'कैलासकानने' इत्यादि से देश का नियम, 'युगपंचकम्‌” इत्यादि से काल का नियम तथा थोडे ही समय में ओर हृदय प्रदेश में ही उक्त अनुभव होने से देशकाल का अनियम यह कैसे हो सकता है, क्योकि देश ओर काल के नियम का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता, इस प्रकार का प्रश्नार्थं हे