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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verses 33–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 85, verses 33–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 33,34

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

महामुनि वीतहव्य का हृदय (हृदय से उपलक्षित आत्मा) हम लोगों के समस्त आत्माओं के स्वरूपभूत था, इसलिए सम्पूर्ण प्राणियों को होनेवाले जगत्‌ के अनुभव भी उन्हीं के अनुभव हैं, ऐसा भी कहने में किसी प्रकार की बाधा नहीं है, इस आशय से कहते हैं। हे राघव, ब्रह्माण्ड के एक कोने में अवस्थित महामुनि वीतहव्य की आत्मरूपता को प्राप्त हुए वास्तविक स्वरूपसत्ता से वर्जित और भ्रान्तिवश अत्यन्त विशाल मालूम पड़ने वाले उन अंसख्य भुवनों में, जाकर आत्मा के तत्त्वज्ञान से वंचित अज्ञानी इन्द्र हुआ था, वही आज "दीन" नाम के देशों में राजा होकर इस समय भी जंगल में शिकार खेलने में प्रवृत्त हुआ हे