Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
तामवस्थामथासाद्य मनसा तन्मनस्तृणम् ।
मनागपि प्रस्फुरितं निमिषार्धादशातयत् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
ये महामुनि वीतहव्य न तो गुण दृष्टि से किसी वस्तु की स्तुति करते थे ओर न
दोषदुष्टि से किसी की निन्दा भी कभी करतेथे। वे न तो कभी उद्वेग को प्राप्त होते थे ओर न कभी हर्ष
को प्राप्त होते थे