Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
पुरुषः सांख्यदृष्टीनामीश्वरो योगवादिनाम् ।
शिवः शशिकलाङ्कानां कालः कालैकवादिनाम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसी बात है, तो व्यवहाररूपी कार्य की सिद्धि किस रीति से होगी ? तो काकतालीय न्याय से
होगी, यों गृहद्ष्टान्त से कहते हैं।
अरण्य से लकड़ी उत्पन्न हुई, बाँसों की त्वचा से लकड़ी के बोझ को बाँधने की पूर्ति रज्जु हुई,
वसुला, कुठार आदि लोहे से उत्पन्न हुए और बढ़ई अपने उदर की पूर्ति के लिए ही प्रवृत्त हुआ, न कि
घर की सिद्धि के लिए