Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verses 20–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
आत्मात्मनस्तद्विदुषां नैरात्म्यं तादृशात्मनाम् ।
मध्यं माध्यमिकानां च सर्वं सुसमचेतसाम् ॥ २० ॥
यत्सर्वशास्त्रसिद्धान्तो यत्सर्वहृदयानुगम् ।
यत्सर्वं सर्वगं सार्वं यत्तत्तत्सदसौ स्थितः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यों इस लोक में अपने-अपने भिन्न-भिन्न प्रयोजन के लिए अवस्थित
पदार्थों की यानी क्रिया-कारकरूप पदार्थों की सामग्री से अर्थतः उत्पद्यमान दृढ़ गृहाकृति जैसे
काकतालीय ही है यानी काकतालीय न्याय से ही सिद्ध होती है, वैसे ही प्रकृत कार्यकरणसंघात स्थल में
भी काकतालीय न्याय से ही दर्शन, श्रवण, आदान आदि अपनी-अपनी शक्तियों से नियत ज्ञान-
कर्मेन्द्रियों से समन्वित तत्-तत् उस प्रकार की व्यवहाररूप कार्यकलिका चंचलतापूर्वक उत्पन्न हुई
है, उसमें किसी की क्या क्षति है अर्थात् किसी को कोई क्षति नहीं हे