Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यदनुत्तमनिःस्पन्दं दीप्यते तेजसामपि ।
स्वानुभूत्यैकमात्रं यद्यत्तत्तत्सदसौ स्थितः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अब अविद्या दूर से ही
विस्मृत हो गई, आत्मविद्या विस्पष्टरूप से अनुभूत हो गई, जो सत् था वही सत् रहा, असत् असत् ही
रहा, विघ्न क्षीण हो गया और जो स्थिति के योग्य था, वही स्थित रह गया