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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

तिष्ठन्नक्षुभिताकारश्चिन्तामणिरिवात्मनि । संपूर्ण इव शीतांशुर्विश्रान्त इव मन्दरः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

अस्ति ओर नास्ति यों दो प्रकार दृश्य कल्पनाओं का, कोमल लता की नाई, विनाश कर उन दो कल्पनाओं के साक्षीरूप से अवशिष्ट चैतन्यमात्र का अवलम्बन कर शरीर, शिर ओर ग्रीवा को समानरूप से रखकर दृढासन होकर मैं उस प्रकार अचल बैठता हूँ, जिस प्रकार पर्वत का शिखर