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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

कुम्भकारगृहे चक्रं संरोधित इव भ्रमात् । अम्भोधिरिव संपूर्णस्तिमितस्फारनिर्मलः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं यद्यपि सदा उदित स्वभाव (प्रकाश स्वभाव) हूँ, तथापि अज्ञ दृष्टि से अन्धकार को प्राप्त हुआ-सा हूँ एवं यद्यपि सदा जीवित स्वभाव हूँ, तथापि अज्ञदुष्टि से मृत-सा हूँ । तत्त्वदृष्टि से तो उससे विपरीत निर्मल स्वभाव को प्राप्त हुआ एकरस चिन्मात्रस्वरूप होकर अवस्थित हूँ