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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 46

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अनेक दुःखों से खिन्न तथा दोषों से (समाधि के विघ्नो से) द्रवीभूत हुए मैंने शोक का विनाश करने के लिए उत्तम सखीभूत तुम अकेली का ही आश्रय किया