Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 45
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हिन्दी अर्थ
हे सखी
गुहातपस्विनि, संसाररूपी महामार्ग में खिन्न हुए मेरे लिए तुम ही अकेली आश्वासन देने में समर्थ,
अत्यन्त स्नेह से समन्वित, पूर्ण आत्मा में विश्रान्ति-प्रदान द्वारा समस्त लोभो को नाश करनेवाली
तपस्या (मित्र) हुई