Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 56
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हिन्दी अर्थ
अब प्रत्येक इन्द्रिय आदि के द्वारा प्राप्त करने योग्य प्रकृति को विभागपूर्वक बतलाते हैं।
यह चक्षु का प्रकाश आदित्य मण्डल में प्रवेश करे सुगन्धिहेतुक आनन्दज्ञान की करण प्राणेन्द्रिय
गन्ध की आश्रय पृथ्वी में प्रविष्ट हो जाय