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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 57

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

शब्दों की श्रवणशक्ति यानी श्रोत्रेन्द्रिय आकाश कुक्षि में प्रविष्ट हो जाय ओर रसना की रसग्रहणशक्ति यानी रसनेन्द्रिय चन्द्रमण्डलरूपी जल में प्रविष्ट हो जाय