Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 87, Verses 58–59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 87, verses 58–59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 58,59
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हिन्दी अर्थ
उस प्रकार उपाधिभूत आप लोगों के अपनी-अपनी प्रकृतियों में प्रविष्ट हो जाने पर आपे
प्रतिबिम्बित चिदाभासस्वरूप मैं जीवात्मा भी अपने बिम्बरूप प्रणव की चतुर्थ अर्धमात्रा से लक्षित
ब्रह्मात्मा में प्रविष्ट हो जाता हूँ यानी विश्रान्ति लेता हूँ, यों कहते हैं ।
मन्दराचल के अभाव में समुद्र की नाई, सूर्य के अभाव में दिन की नाई, शरत् कालमें अपने उपादान
कारण में विलय को प्राप्त हुए मेघ की नाई, इन्धनं के दग्ध होने पर अग्नि की नाई तथा स्नेह (तेल) के
अभाव में दीपक की नाईं ओंकार की अन्तिम अर्धमात्रा से लक्षित परब्रह्मस्वरूप अपने में अपने आपसे
ही मेँ आत्यन्तिक मनःशान्तिपूर्वक विश्रान्ति लेता हूँ