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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verses 11–12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 88, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

तदेताममलां दृष्टिमवलम्ब्य महामते । ज्ञानमासादय परं ज्ञानान्मुक्तिर्हि लभ्यते ॥ ११ ॥ ज्ञानान्निर्दुःखतामेति ज्ञानादज्ञानसंक्षयः । ज्ञानादेव परा सिद्धिर्नान्यस्माद्राम वस्तुतः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, तदनन्तर वायुशून्य प्रदेश में स्थित दीपक की नाई विस्पष्ट प्रकाश को प्राप्त हुए अपने स्वरूप में स्थित संवित्‌ का, जो तत्क्षण उत्पन्न हुए बालक के ज्ञान के सदुश वासनादि से वर्जित थी, अवलम्बन कर चिति की चेत्यदशारूप कल्पना को उसकी उत्पत्ति के पहले ही समर्थ मुनि वीतहव्य ने निमेष के चतुर्थ भागात्मक काल में ही उस प्रकार परित्याग कर दिया, जिस प्रकार वायु स्पन्दन शक्ति का परित्याग कर देता है