Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 88, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
ज्ञानेन सकलामाशां विनिकृत्य समन्ततः ।
शातिताशेषचित्ताद्रिर्वीतहव्यो मुनीश्वरः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, तदनन्तर इस रीति से साक्षिमात्र के
परिशेषस्वरूप "पश्यन्ती" पद को प्राप्तकर अनन्तर "पश्यन्ती" पद ही आकाश आदि के बाधाश्रय रूप
से अवशिष्ट सत्तामात्र स्वरूप कारणतत्त्व होने के कारण तद्धाव में स्थितिरूप सुषुप्त स्थान को प्राप्त
कर मुनि वीतहव्य पर्वत की नाई अचल होकर स्थित हो गये