Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 88, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
वीतहव्यो मनोमात्रं मनोहंत्वमिवैन्द्रियः ।
मनो जगदिदं कृत्स्नमन्यतानन्यते तु के ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर उनका स्वरूप कैसा था ? इस चतुर्थ प्रश्न का उत्तर देते हैं।
जैसे रात्रि मे देखनेवाले उल्लू आदि को अन्धकार ही प्रकाशरूप होता हे, वैसे ही उस तुर्य अवस्था
में वे मुनि विषयप्रयुक्त आनन्द से वर्जित होते हुए भी स्वरूपभूत आनन्द से युक्त थे, स्वभिन्नसत्ता से
शून्य होते हुए भी स्वरूपतः सत्तारूप थे, स्वभिन्न वस्तुस्वरूप से अकिंचिद्रूप होते हुए भी स्वतः किंचिद्रूप
थे