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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 89, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 89, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

ये केचन जगद्भावास्तानविद्यामयान्विदुः । कथं तेषु किलात्मज्ञस्त्यक्ताविद्यो निमज्जति ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

महामुनि वीतहव्य ने अपने हृदय में संकल्पमय जगत्‌ का और उसमें गणत्व का अनुभव किया, ऐसा पहले कहा गया है, ऐसी स्थिति में उन्होने उस संकल्पमय जगत्‌ के अन्तर्गत सूर्य में प्रवेश कर वहाँ के पिंगल नामक गण के द्वारा इस दृश्यमान जगत्‌ के भूभाग में अवस्थित अपनी देह का उद्धार किस प्रकार किया ? क्योकि स्वप्न के कुदालों से जाग्रत्‌ की निधियों का खनन नहीं देखा जाता है, इस प्रकार की श्रीरामजी की शंका को चिन्हों से ताड़कर वस्निष्ठजी कहते हैं। उस वीतहव्यात्मिका संवित्‌ ने अपने हृदय से उपलक्षित ब्रह्म में हम लोगों के साधारण दृश्य को ही अपना संकल्प जगत्‌ है, ऐसा अनुभव किया, दूसरे अपूर्व जगत्‌ का अनुभव नहीं किया