Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 89, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 89, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सुखदुःखक्रमैरात्मा न कदाचन गृह्यते । सर्वगोऽपि महाबाहो किं मुधा परिशोचसि ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

समस्त देह में व्याप्त होकर रहनेवाले प्राणों का हृदय में उपसंहार कहते है। देहरूपी वृक्ष के भीतर अवस्थित, पक्षी की नाई आचरण करनेवाले उसके तत्‌-तत्‌ नाडी स्थान का परित्याग कर हृदयरूपी घोंसले की ओर उस प्रकार आ गये, जिस प्रकार यन्त्रो से उन्मुक्त शिलाएँ । यहाँ "देहरूपी वृक्ष के अन्दर अवस्थित हृदयरूपी नीड का परित्याग कर प्राण बाहर आ गये” ऐसा अर्थ नहीं करना चाहिए, क्योंकि “न तस्य प्राणा उत्करामन्त्यत्रैव समवलीयन्ते ब्रह्मैव सन्‌ ब्रह्माप्येति" (तत्वज्ञ के वाक्‌ आदि प्राण जाते नहीं है, यहीं लीन हो जाते हैं, वह जीवित दशा में ही ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म को प्राप्त करता है) इत्यादि श्रुति के साथ विरोध होगा ओर समस्तकर्म ओर तज्जनित वासनाओं का क्षय हो जाने के कारण उस प्रकार के उत्क्रमण में कोई बीज या प्रयोजन नहीं है