Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 89, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 89, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि विजहार यथासुखम् । वीतहव्यो वीतशोकस्तथा विहर राघव ॥ २ ॥ अन्ये च राजन्मुनयो ज्ञातज्ञेया महाधियः । यथावसन्स्वराष्ट्रे त्वं तथैवास्व महामते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

महामुनि वीतहव्य के उस प्रकार परम विश्रान्त होने पर निरतिशयसुखात्मक मोक्ष को प्राप्त हो जाने पर तथा समुद्र मँ जलकण की नाई अपने पद मे प्रतिष्ठित हो जाने पर उसी प्रकार अवस्थित हो रहा क्रियाशून्य वह देह भीतरी विरसता को प्राप्त होकर उस प्रकार म्लान हो गया, जिस प्रकार हेमन्त -ऋतु में कमल म्लान हो जाता है (कुम्हला जाता है)