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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 89, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 89, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । वीतहव्यवदात्मानं नीत्वा विदितवेद्यताम् । वीतरागभयोद्वेगस्तिष्ठ राघव सर्वदा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी उक्त रीति से संसार की अवधि के अन्तिम स्थानभूत पर ब्रह्म को प्राप्त करने के अनन्तर दुःखसागर के पार को प्राप्त हुए महामुनि वीतहव्य आत्यन्तिक मनोनाश होने पर परम विश्रान्त हो गये

सर्ग सन्दर्भ

सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त अट्टासीवाँ सर्ग वीतहव्य के विमुक्त होने पर हृदय में उनके प्राणों का लय हुआ, कारण में देह का लय और कलाओं का लय हुआ, यह वर्णन ।