Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 88, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 24
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हिन्दी अर्थ
वह वीतहव्य मुनि उक्त क्रम
सेमुक्त लोगों की दृष्टि में आकाश के स्वरूप की अपेक्षा निर्मल स्थितिवाले होकर उत्पत्ति शून्य, जरारहित,
कारणवर्जित, अद्वितीय, मल से रहित एवं अवयवरहित पद स्वरूप होकर अवस्थित थे ओर बद्ध लोगों
की दृष्टि में क्षण में ईश्वर होकर अपने कार्यो कि भेद से अनेक ओर अवयवयुक्त होकर अवस्थित थे