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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 89, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 89, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

जीवन्मुक्तशरीराणां कथमात्मविदां वर । शक्तयो नेह दृश्यन्ते आकाशगमनादिकाः ॥ ९ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । आकाशगमनादीनि यान्येतानि रघूद्वह । प्रमाणिताः पदार्थानां सहजाः खलु शक्तयः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

अब भगवान्‌ वस्निष्ठजी कृपा के आधिक्य से कहे गये, कहे जा रहे और कहे जानेवाले ग्रन्थ का; चिरायु और सर्वदर्शी हम लोगों के द्वारा सब प्रकारों से अनेक बार किये गये विचारों का; लोक, शास्त्र, श्रुति तथा अन्वय और व्यतिरेक से परीक्षा करके किये गये पुनः-पुनः दर्शन को एकात्म्यद्ष्टि को अवलःम्बित कर ज्ञानप्रतिष्ठा प्राप्त करना ही फल है, इससे अधिक और कुछ पुरुष को सम्पादन करने का नहीं है, यह निर्णीत हुआ, यों विश्वास को दृढ़ करने के लिए कहते हैं। हे श्रीरामजी, जिसका आपके सामने मैंने वर्णन किया, जिसका वर्णन कर रहा हूँ और जिसका वर्णन करूँगा, त्रिकाल को प्रत्यक्षरूप से देख रहे तथा चिरकाल तक जीनेवाले हम लोगों ने उसके विषय में विचार किया है और पूर्णरूप से उसको स्वयं देखा भी है