Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verses 16–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 9, verses 16–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 16-20
संस्कृत श्लोक
अरज्जुरेव बद्धोऽहमपङ्कोऽस्मि कलङ्कितः ।
पतितोस्म्युपरिस्थोपि हा ममात्मन्हता स्थितिः ॥ १६ ॥
कस्मादकस्मान्मोहोयमागतो धीमतोऽपि मे ।
असितः पिहितालोको भास्कराग्रमिवाम्बुदः ॥ १७ ॥
क इमे मे महाभोगाः क इमे मम बान्धवाः ।
बालो भूतमयेनेव संकेतेनाहमाकुलः ॥ १८ ॥
स्वयमेव निबध्नामि जरामरणरागिणीम् ।
किमिमामहमेतेषु धृतिमुद्वेगकारिणीम् ॥ १९ ॥
यातु तिष्ठतु वा सम्यङ् ममैतां प्रति को ग्रहः ।
बुद्बुदश्रीरिवैषा हि मिथ्यैवेत्थमुपस्थिता ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं बिना रस्सी के ही बँधा हूँ । बिना पंक के ही कलंक से
युक्त हूँ। सबसे ऊपर स्थित होकर भी नीचे गिरा हूँ । ओह ! स्वरूप में मेरी जो स्थिति है, वह नष्ट हो
गई। यद्यपि मैं बुद्धिमान हूँ तथापि जैसे सूर्य के सामने प्रकाश को आच्छादित करनेवाला काला मेघ
आता है, वैसे ही मेरे सामने आत्मप्रकाश को आच्छादित करनेवाला यह मोह कहाँ से आया ? ये
महाभोग मेरे कौन हैं ? ये बन्धुगण मेरे कौन हैं जैसे बालक भूत के भय से व्याकुल हो उठता है वैसे ही
मैं इसमें ममतारूप सम्बन्ध की कल्पना से व्याकुल हो गया हूँ। इस भोगों में जरा, मरण को प्राप्त
करानेवाली एवं उद्वेग देनेवाली इस आस्था को मैं स्वयं ही क्यों बाँध रहा हूँ यह भोग ओर बान्धव
आदि की सम्पत्ति भले ही अच्छी तरह से चली जाय या रहे, इसके प्रति मेरा क्या आग्रह है ? बुद्बुद् की
शोभा की भाँति यह मिथ्या ही इस प्रकार प्राप्त हुई है