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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verses 44–46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 9, verses 44–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 44-46

संस्कृत श्लोक

येषां निमेषणोन्मेषैर्जगतां प्रलयोदयौ । तादृशाः पुरुषाः सन्ति मादृशां गणनैव का ॥ ४४ ॥ सन्ति रम्यतराद्रम्याः सुस्थिरादपि सुस्थिराः । चिन्तापर्यवसानेयं पदार्थश्रीः किमीहसे ॥ ४५ ॥ संपदश्च विचित्रा यास्ताश्चेच्चित्तेन संमताः । तत्ता अपि महारम्भा हन्त मन्ये महापदः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि राजा होने के कारण निग्रह ओर अनुग्रह में समर्थ, उत्तम पुरुषरूप आपको विषयों मे आश्वासन क्यो न प्राप्त होगा ? इस पर कहते है । जिनके नेत्रनिमीलन ओर नेत्रोन्मीलन से प्रलय और सृष्टि होते है, वैसे पुरुष भी जब विद्यमान हैं, तो मेरी क्या गणना है ? भाव यह है कि ब्रह्मा आदि महापुरुषों को भी जब आश्वासन नहीं प्राप्त हुआ, तो मेरी क्या गणना है ? मनोहर से भी मनोहर एवं स्थिर से भी स्थिर पदार्थ हैं; परन्तु इन पदार्थो की शोभा का फल उपार्जन, रक्षण, वियोग आदि से चिन्तारूप ही हे; इसलिए क्यों उसकी इच्छा करते हो ? विविध रत्न, घोड़े, हाथी, धन, रत्री आदि के भेद से विचित्र सम्पत्तियाँ यदि चित्त से आदरणीय हे, तब वे भी बहुत प्रयत्नो से प्राप्त करने योग्य, दुःख से रक्षा करने योग्य अवश्य नष्ट होनेवाले होने के कारण महाआपत्तिर्यो ही हैं, ऐसा मेरा मत हे