Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 9, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
आपदोऽपि विचित्रा यास्ताश्चेन्मनसि संमताः ।
तत्ता अपि महारम्भा मन्ये मनसि संपदः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी तरह यदि दरिद्रता, बन्धनाश, राज्यनाश
आदि आपत्तिर्यो भी साधु संगति, तीर्थ तपस्या, ज्ञान आदि की प्राप्ति करा देने से विचित्र अतएव
कल्याणकर ही हैं, यों मन में भान हो, तो वे भी विवेक, वैराग्यआदि महाआरम्भ से युक्त सम्पत्तिर्यो ही
है, यों मैं मानता हूँ