Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
नष्टं कस्य मनो ब्रह्मन्नष्टं वा कीदृशं भवेत् ।
कीदृशश्चास्य नाशः स्यात्सत्ता नाशस्य कीदृशी ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
-शरीराणाम्* इस शब्द से प्रारब्ध होने पर वीतहव्य मुनि को अपने में जैसे विद्याधरत्व आदि का
साक्षात्कार हुआ, वैसे ही मानसिक सिद्धियाँ भी हो ही सकती हैं, यह आशय है।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे रघुकुलभूषण, जो ये देवताओं की आकाशगमन आदि सिद्धियाँ
प्रमाणों से उपलब्ध होती है, वे अग्नि में ऊर्ध्वं ज्वलन की नाई स्वभावतःसिद्ध हैं