Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
सुखदुःखदशा धीरं साम्यान्न प्रोद्धरन्ति यम् ।
निःश्वासा इव शैलेन्द्रं चित्तं तस्य मृतं विदुः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब मनुष्यों को योग की सिद्धि के द्वारा आकाशगमन आदि की प्राप्ति कैसे होती है इस पर
कहते हैं ।
हे राघव, आत्मतत्त्वज्ञान से शून्य प्राकृत अमुक्त जीव भी मणि, ओषध आदि द्रव्यों की शक्ति से,
योगाभ्यास आदि क्रियाओं की शक्ति से, उसके परिपाक प्रयोजक काल की शक्ति से आकाशगमन
आदि किसी समय प्राप्त कर सकता हे । जैसे कि चींटी ग्रीष्म की समाप्ति मेँ कालशक्ति के प्रभाव से
पंख-प्रादुभाव द्वारा आकाशगमन प्राप्त करती है