Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
संशान्तदुःखमजडात्मकमेव सुप्तमानन्दमन्थरमपेतरजस्तमो यत् ।
आकाशकोशतनवोऽतनवा महान्तस्तस्मिन्पदे गलितचित्तलवा वसन्ति ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे क्रिया-फल स्वर्गादि में आत्मज्ञान का उपयोग नहीं है, वैसे ज्ञानफलमुक्ति मे द्रव्य, देश,
क्रिया आदि का भी उपभोग नहीं है, ऐसा कहते हैं।
आत्मतत्त्वज्ञान के फलभूत परमात्मा के पद के लाभ में यानी मोक्ष में द्रव्य, देश, क्रिया, काल आदि
युक्तियाँ कोई भी उपकार नहीं कर सकती