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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 57

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जिस महामति के हाथ, पैर तथा प्राण आदि से युक्त शरीर में चित्तजनित अथवा वातजनित स्पन्दन नहीं रहता, उसके शरीर में वृद्धि आदि तथा क्षय आदि विकार उत्पन्न नहीं होते