Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 58
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हिन्दी अर्थ
हे तत्त्वज्ञ-शिरोमणे, हाथ आदि बाह्य और प्राण आदि आन्तर अवयवों से युक्त शरीर में स्पन्दन-
वृत्ति के प्रशान्त हो जाने पर त्वचा आदि धातुएँ अपनी पूर्वावस्था का कभी भी परित्याग नहीं करतीं