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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 59

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसी तरह चित्तजनित और वातजनित देह स्पन्दन के शान्त हो जाने पर त्वचा आदि धातुएँ अपने चंचल स्वरूप से भलीभाँति स्तम्भित होकर मेरु पर्वत के सदुश दृढ़ स्थिरता धारण करती हैं