Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 63
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
हे भद्र, जो विषयअभिलाषाओं से वर्जित, अज्ञानग्रन्थि से निर्मुक्त तथा विदित
वेद्य महामति महात्मा हैं, वे सब अपनी देह के विषय में स्वतंत्र होकर स्थित रहते हैं यानी देह को रखना
या छोड़ना उनकी इच्छा की बात है । क्योकि श्रुति भी है "तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते आत्मा हयेषां
स भवति" (तत्त्वज्ञ महाविद्वान् का देवता अभूति के लिए यानी सर्वात्मक ब्रह्मभाव प्राप्ति के निराकरण
के लिए समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह देवताओं के आत्मस्वरूप हो जाता है)