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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 91, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । परमाकाशकोशाद्रिरूढलोकान्तरद्रुमम् । तारकापुष्पशबलं देवासुरविहंगमम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

नब्बेवाँ सर्ग मैत्री आदि गुणों से उपेत तथा निष्कल भाव को प्राप्त दो प्रकार के चित्त-नाश का विस्तारपूर्वक वर्णन । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : महाभाग, वीतहव्य का चित्त जब विचार से, भूजि बीज की नाई, अंकुरशक्ति से रहित हो गया था ओर प्रतिभास से रहित नहीं हुआ था, तब उसमें मेत्री आदि गुणों का आविर्भाव हो गया