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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 68

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार करते है । श्रीरामजी, समस्त वासनाओं से विनिर्मुक्त तथा अज्ञानरूपी बन्धन से वर्जित होने के कारण तत्काल ही अन्तःकरणउपाधिक वीतहव्य का जीव पारमार्थिक आत्मस्वभाव उदित हुआ । चूँकि वह सकल शक्तियों के निधि महेश्वर ही थे, अतः जो चाहते थे, उसी समय वह हो जाता था। कहा भी है : तुषेण बद्धो व्रीहिः स्यात्‌ तुषाभावे तु तण्डुलः । पाशवद्धः सदा जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः ॥ जैसे छिलकों से युक्त चावल धान कहा जाता है ओर छिलकों के अभाव में यानी शुद्ध तंदुल कहा जाता है, वैसे ही अज्ञानरूपी पाश से युक्त चेतन सदा जीव कहा जाता हे और अज्ञानपाश से वर्जित चेतन शुद्ध सदा शिव कहा जाता है