Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 67
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हिन्दी अर्थ
काकतालीय न्याय से वीतहव्य की संवित् ने उस समय जीने की
भावना की ओर उसी को तत्काल स्थिर कर डाला ॥ ६ ६॥ प्रारब्ध की समाप्ति हो जाने पर जब वीतहव्य
की प्रतिभा (संवित्) विदेहमुक्तता की ओर झुक गई यानी उसने विदेहमुक्ति की भावना की, तब वह
विदेहमुक्त हो गये, क्योकि यह मुनि अपने जीने आदि में स्वतन्त्र थे