Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 90, Verses 65–66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 90, verses 65–66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 90 · श्लोक 65
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हिन्दी अर्थ
हे प्रीतिपात्र श्रीरामजी, इसलिए तत्त्वज्ञो का अन्तःकरण काकतालीय की नाई अकस्मात् जिस
क्षण में जिस किसी की यानी प्रारब्ध प्राप्त जीवन या मरण की भावना करता है, उसी क्षण में उस को
ठीक रूप से कर डालता है