Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 91, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य वृत्तिव्रततिधारिणः ।
एकं प्राणपरिस्पन्दो द्वितीयं दृढभावना ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस नररत्न को आपत्ति, कार्पण्य यानी दरिद्रता, उत्साह यानी पुत्रादि प्राप्ति प्रयुक्त
हर्ष, मद, मन्दता (अपटुता) और महोत्सव यानी विवाह आदि विरूपता की (विकारिता की) ओर नहीं
ले जाते, विद्वान् लोग उसके चित्त को नष्ट चित्त कहते हैं