Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
रूपं तद्दर्शनं ज्ञानं क्षीयते तेन वासना ।
निःसङ्गव्यवहारित्वाद्भवभावनवर्जनात् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें पहले वासना का स्वरूप कहते है ।
पहले के जन्मों की दृढ़ भावना से देह आदि जड पदार्थो का जो “अहम् “मम” इत्यादि संस्काररूप
से आदान (ग्रहण) होता है, वह यदि पूर्वापर विचार से शून्य हो जाता है तो वह वासना शब्द से व्यवहृत
होता है "वासयति भावयति इति वासना, व्युत्पत्ति से आत्मा को देह आदि भावों मे भावित करनेवाला
संस्कार वासना कहा जाता है । पूर्वापर के विचारों से युक्त जीवन्मुक्त महात्मा ओं का देह आदि संस्कार
वासना नहीं हे, क्योकि विरोधी पूर्वापर विचारों से समन्वित होने के कारण उनको उक्त संस्कार देहादि
भावों में भावित नहीं कर सकता, यह भाव है