Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
मुग्धमुग्धधियो भीता वराका हरिणा इव ।
मतिरालूनशीर्णाङ्गी तदीया पेलवाङ्गिका ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
अब अचित्तत्व का लक्षण कहते हैं।
हे श्रीरामजी, बाह्यवस्तुओं से अस्मरणरूप निरोधयोग का अवलम्बन करने से समस्त दृश्यों के
परिमार्जन-स्वरूप अभाव का सम्पादक पारमार्थिक आत्मदर्शन से जो स्वरूप आविर्भूत होता है, वह
अचित्त कहा जाता है