Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 78
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 78 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 78
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी ने कहा : भगवन्, एक ही पदार्थ अजड भी और असंवित्तिरूप भी कैसे हो सकता है ?
असंवित्तिरूप होने पर वह जडता कैसे निवृत्त होगी ? तात्पर्य यह है किं जडता का परित्याग होने
पर संवेदन का शेष अवश्य रहेगा ओर संवेदन का परित्याग होने पर जडता का शेष अवश्य रहेगा,
ऐसी स्थिति में एक ही पदार्थ अजड और असंवित्ति रूप - यों विरुद्ध स्वभाववाला कैसे हो सकता
है यह आप मुझसे कहिए