Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 79

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 79 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 79

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, संवित्‌-शब्द का एक अर्थ है - बाह्य अर्थो को सत्यरूप से जानना । इस अर्थ को लेकर बाधित अर्थो के अनुभवों से व्यवहार आभास को दिखला रहा भी जीवन्मुक्त महात्मा समस्त वर्तमान विषयों मे आस्था नहीं रखता एवं वासना का क्षय हो जाने के कारण भूत ओर भविष्यत्‌ की वस्तुओं मे भी कहीं आस्था नहीं रखता, इसलिए किसी भी वेद्य को सत्यरूप से न जानने के कारण उतने अंश को लेकर काष्ठ-लोष्ट की नाई असंवित्‌ रूप ओर स्वतः तो स्वप्रकाश चिदेकरस से पूर्णं होने के कारण अजडरूप कहा जाता है, यह तात्पयर्थ है