Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 96
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 96 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 96
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हिन्दी अर्थ
हे भद्र, जगत् केवल संविन्मात्रस्वरूप ही हे, उससे पृथक् दूसरी कोई कल्पना ही नहीं है, इस
प्रकार के ज्ञान से ही संवित् अद्बयरूपता प्राप्त करती है